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Monday, November 28, 2011

Fir Desh Ko Kyon Behaal Kiya Hai


फिर देश को क्यों बेहाल किया है 

नागार्जुन की कविताओं में क्या तुमने कभी अकाल जिया है?
दिनकर की रचनाओं से क्या तुमने विक्रांत ख्याल लिया है?
शहीद सुभाष से सीखे क्या आतंक वादी को बवाल दिया है?
बापू भांति किसी पीड़ित का क्या तुमने कभी मलाल लिया है?
यह कुछ तो तुम कर न पाए, फिर देश को क्यों बेहाल किया है?

रातों जग किसी वैज्ञानिक सा कोई खोज या कमाल किया है?
नेक नागरिक की खातिर क्या अपनों से ही सवाल किया है?
अनाथ बालकों के भोजन को क्या कभी चंदा डाल दिया है?
क्या सरहद पर न्योछावर वीर के परिवार का हाल लिया है?
भ्रष्टाचार और महंगाई से, फिर देश को क्यों बेहाल किया है?

Sunday, November 27, 2011

All That You Deserve Is Null

Soup boys seem to follow Majrooh Sultanpuri's adage 'May you burn in hell Anamika' rather than Sahir Ludhianwi's 'Move on from a beautiful juncture'.

All That You Deserve Is Null

Why do soup boys sing why this kolaveri di,
When you forced the fairy to say no already?
By the way you treat a girl,
All that you deserve is null.

If you stalk her for a week or two,
Still proposal doesn’t go through,
You thunder, ‘Listen, I love you’
And show her all your colors true.

If you think parents won’t agree,
Yet want status of some degree,
And flaunt her as a piece of filigree,
You invite wrath on your pedigree.

If you know that she is really pampered and lazy,
You say that post marriage your life looks hazy,
As you the husband will have to cook like crazy,
Then all you want is a chef to make your life easy.

If you ask her indirect questions,
She isn’t blind to your intentions,
As you continue with pretensions,
You betray trait’s ugly dimensions.

If you think you really like her,
Yet fear of denial is a bit of bother,
What your pals gonna say for ever,
Ego is what you love, not really her.

Why do soup boys sing why this kolaveri di,
When you forced the fairy to say no already?
By the way you treat a girl,
All that you deserve is null.


Saturday, November 26, 2011

Kuch Adhoora Sa

'Their' attitude towards a girl is a true reflection of her position in the society. Many things have changed in favor of the so called Lakshmi, many are yet to change. These lines convey the feelings of a girl whose thoughts belong to the next generation.

कुछ अधूरा-सा 

बड़े शहर में जब जन्मी कन्या, दूर गाँव से दादी आयी,
किन्नर भी आये आशीर्वाद सजाये और भेंट  मंगायी,
दादी को लगा फिर सदमा, किन्नरों पर ढेर चिल्लायी,
माँ का मन कशमकश में, बेटी मंद मंद मुस्कुरायी |

रेल में भी किन्नरों ने जब तरफदारी नहीं दिखलायी,
अनसुनी कर पीर की झल्लाहट, कन्या से भेंट कमायी,
किसी ने तो उसकी काबिलियत पर सहमती जतलायी,
इस जीत की पताका बनी वो गर्वित फूली न समायी |

दुल्हन बनी बेटी ने अपनी अनोखी इच्छा बतलायी,
'किन्नर बुलवाएँ'? सुन घरातियों की टोली चकरायी,
रूठी रानी संभल गयी जब माँ ने यह उम्मीद जगायी,
उसकी बेटी की शादी पर होगी यह सामाजिक सच्चाई |



Friday, November 25, 2011

I Am A Regular Kid

Claim: We kids with our regular activities are as beneficial for humanity as are bees and their nectar stealing for flowers.

I Am A Regular Kid

I am a regular kid and I know it.
Neighbors, oh they won’t show it!

You must have seen its jumbo nails,
Blood stained green zillions of nails,
That real ghost lives in Gulmohar.
I climbed up to befriend the specter,

There was one more, albeit slender,
Stuck on a wire, to my wonder,
As I chanced to trespass the clown,
It pushed me off and I fell down.

Floating in an aerial ambiance,
With ample frolic as I jived,
Wow, it was the best experience,
Sorrow, it was so short lived.

As my head got readily rooted,
In soil heap just below the tree,
I looked like one too, undisputed.
Savoring rare mutation spree,

With branching legs and a torso trunk,
Adorned with toes as if leaves shrunk,
Offshoots of arms and sepals of nails.
Unmindful of my protests and wails,

I was pulled out of the yummy soil,
And drenched with garden hose coil,
To wash away my tasty memories;
And prepare for detested drudgeries,

As lying still to let the pale devil peep,
And scream clots when can’t see deep;
Doc pointed at a worryingly big blot,
Which looks cute and I adore a lot.

See, that’s my gifted brand new brain,
Which gives me spunk and kills refrain.
All grannies are sad and lonely at noon,
Wishing visits from kids as far as moon,

As little tears drip from their eyes,
New brain fails to bear those cries.
I ring their low-rise doorbells,
And deliver generous sequels,

But grannies are still not happy,
They get snappy, call me crappy!
Next I deflate bicycle tires,
All I get in return is ires.

How to tell I am charity trainer,
And pumping is a cellulite slainer!
Soon their junk bodies start to tone,
But my services remain unknown!

They preach bitching is so bad,
Yet gossip makes them go mad,
Try to confirm those back bytes,
All you hear is 'this is heights'!

As trash slips out of houses onto the streets,
I send that back with monkeys and tweets.
They, for my act and words of wisdom,
Have named me king of monster kingdom!

Best is to splash in mini mud pools,
Created fresh by cleaning schools,
And paint sparkling cars all over,
In shades of earth over and over.

Now cleaners drain away the water,
And the pools dry much much faster,
Now roads have started to last longer,
Yet no gain to my image of evil monger!

I am a regular kid and I know it.
Neighbors, oh they won’t show it!

Sunday, November 6, 2011

Raju Ke Haalaat, Gajodhar Ke Saath

(लोकप्रिय कार्यक्रम 'राजू के हालात, गजोधर के साथ' प्रारंभ...
अँधेरे में गजोधर शब्द गूँज रहा है)

गजोधर (सोचत-सोचत): ई कौन माई का लाल जो आधी रात हमार नामवा जपे! 
आवाज़ (चौंककर): अरे गजोधर, तुम्ही चले आये यहाँ!
गजोधर (खुसी-खुसी): अरे राजू भैया आप! कौनो नींद नाहीं आवत गाम में का? अब तो आप सितार-होटलवा वाले जो हो गए!
राजू भैया (परेशान): सो तो है गजोधर पर और भी बड़ी मुसीबत हमार गले पड़ गयली है| कल साम में हमार सो है झुमरीतलैय्या में, पर कौनो नवी चुटकियाँ सूझे ही न!
गजोधर (उत्तेजित): ये कौनो मुसीबत नाहीं भैया! आप पुरानी कहानियां की नवी खिचड़ी पका लेना, ई करन वास्ते तो माहिर हैं आप!
राजू भैया (उदास): न गजोधर न, अब ई नाहीं चलत! इह ससुरे इन्टरनेट ने सब गड़बड़ कर डाला; हर सो का विडियो उसपे टांग देवत हैं और हम जब भी कोई पिछली कहानी दुहराते हैं न, तो लोग लिख देवत हैं की ये तो उस फलाना सो में भी कहे थे| सो के पोड्युसर ये सब पढ़-पढ़ के हमार फीस्वा काट लेवत हैं| 

अब तुम ही बताओ, बाढ़ में सभी भैंसियाँ बही गयी इस साल, नाहीं तो उनको निहार ही कुछ बूझ लेते; कोई नवे नेता  पैदा ही नाहीं होवत, ढेरों बुडबक बुढ़िया गए, गद्दी से फिसल गए, जेल्वा में भर गए; बालीउड में भी सूखा परकोप होवे, मेरी पाखी, पिंकी, डाली, बीना को तो कोई संपवा सुंघा दियो, कोई भी मसालेदार बात न कहें वो आजकल; बची-खुची समस्या, हल करन वास्ते, अन्ना छीन लिए; अब हम का करें? हमको तो दाल-भात की चिंता सुरु हो गयी है, सच कहे दिए हैं गजोधर तुमको!  
गजोधर (हैरान): आप बेकार टेनसनवा लेवत हो भैया! अभी ढेरों नेता बाकी होवे जिनके बारे आप कुछ कहत नाहीं; सबसे पुरानी पार्टीवा के सरगना लोगन को भी तो आप की फुलझड़ियों का हक होवे| का उनकी इतनी इज्जत करो की उनके बारे कबहूँ न बोलत हो?
राजू भैया (फुस्फुसावत): इज्जत नाहीं गजोधर, डर्र! हमहूँ बहूहूहूहूत डर्र लागत है| ओ का है ना, हम चुटकुले बनाने में बीजी रहत हैं, हमको फीस्वा का हिसाब करन वास्ते कौनो टाइम नाहीं मिलत| अब इनकम टैक्स का चक्कर तो तुम्ही जानत हो, कौनो जगन बाबू टाइप हमहूँ फंसा डाले सरकार, तो हम का करेंगे? तौबा तौबा!
गजोधर (गंभीर): अरे ई सम्मस्सा तो बड़ी भारी होवे पर हमहूँ मालूम है आप हल खोज लेवोगे| कहो तो आपका मूडवा तनिक बदल देवें|
राजू भैया (अविचलित): ठीक है|
गजोधर (सरमावत-सरमावत): हमहूँ आपको भैया कहिन से डरत हैं आजकल| जब से आपको देखे हैं साड़ी, चोली, सूट में, का बताएं, हमार दिमाग में भूचाल आया और हमार फ्यूज उड़ गया| हमहूँ कौन बिस्वास ही नाहीं होवत की वो अप्सरा आप...वो अप्सरा हमार दिल चीर ले गयी, हाय!
राजू भैया (गुस्सेल): ई का बक रहे हो गजोधर?
गजोधर (धीमे-धीमे): सच कह दिए हैं, हमहूँ तो 'सिल्पा सा फेगर, बेबो सी अदा' सब भूल गए हैं, बस 'पिंकी सा फेगर, पाखी सी अदा' ही याद आवत हैं आजकल| अब हमार मूंह और जिआदा न खुलाओ, हूँ! 
राजू भैया (परास्त): ...
गजोधर (चिढ़ात): का राजू भैया, हमहूँ कौनो मजाक करन का हक नाहीं का| ये बातिया रिकॉर्ड कर लिए हैं, कल सो में ये टेप चला लेना!
राजू भैया (हैरान): गजोधर, तुम हमार बतिया रिकार्ड करत हो?
गजोधर (मुस्करात): न भैया, वो साम से आप इक बार भी न हँसे, न हंसाये तो हमहूँ समझ गए थे आप परेसान होवत| वैसे भी आप सबहूँ के बारे बोल बोल उनको परसिद्ध कराये, तो कोई आपके बारे न बोले तो बुरा तो लगे है न, तो हमहूँ बोल दीये| 

(अगले कार्यक्रम हेतु विज्ञापन प्रारम्भ)

Wednesday, November 2, 2011

Sandal Speak

Sandal Speak

I was worried about my destiny,
But got packed in silk and satin
And dispatched in a limo shiny,
To be ushered in an aero cabin.

Welcomed by excited screams,
Landed in the courteous city;
To be led to a palace of dreams,
In a procession like a deity.

I was treated to a lavish gloss,
Prepared by a dozen champs
And sequined with golden floss,
To be exalted with lamps.

Adorned on high head of elite,
As Bharat did eons back;
To be strapped on sissy's feet, 
I was taken to her shack.

Stooping officers in public view,
Rubbed across their own hankies,
Till last invisible grime flew,
To felicitate F1 pros and rookies.

I was covered all over in dirt
And left outside the threshold,
To be kicked around and hurt,
Those days are gone and old.

At my smacks the state flinches,
My headlines making virtues,
By raising her glory three inches,
Are to be immortalized in statues.